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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मनुष्यशरीर की महिमा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (पुरुषः) मनुष्य ने (केन) प्रजापति [परमेश्वर] द्वारा (इमाम् भूमिम्) इस भूमि को (और्णोत्) ढका है, (केन) प्रजापति द्वारा (दिवम्) आकाश को (परि अभवत्) घेरा है। (केन) प्रजापति द्वारा (मह्ना) [अपनी] महिमा से (पर्वतान्) पर्वतों और (केन) प्रजापति द्वारा (कर्माणि) रचे हुए वस्तुओं को (अभि=अभि अभवत्) वश में किया है ॥१८॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमेश्वर की उपासना से विवेक और आत्मिक बल द्वारा सृष्टि के सब पदार्थों को वश में करे ॥१८॥
टिप्पणी: १८−(केन) म० ५। कर्ता प्रजापतिना सह (इमाम्) (भूमिम्) (और्णोत्) आच्छादितवान् (केन) परमेश्वरेण (परि अभवत्) सर्वतो व्याप्तवान् (दिवम्) आकाशम् (केन) (अभि) अभ्यभवत्। व्याप्तवान् (मह्ना) महिम्ना (पर्वतान्) शैलान् (केन) (कर्माणि) कृतानि रचितानि वस्तूनि (पुरुषः) मनुष्यः ॥
