0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मनुष्यशरीर की महिमा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (केन) किस [सामर्थ्य] से उस [परमेश्वर] ने (आपः) जल को (अनु) लगातार (अतनुत) फैलाया है, (केन) जिस [सामर्थ्य] से (अहः) दिन (रुचे) चमकने के लिये (अकरोत्) बनाया है। (केन) किस [सामर्थ्य] से उसने (उषसम्) प्रभात को (अनु) लगातार (ऐन्द्ध) चमकाया है, (केन) किस [सामर्थ्य] से उसने (सायंभवम्) सायंकाल की सत्ता को (ददे) दिया है ॥१६॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य को जानना चाहिये कि परमेश्वर ने किस सामर्थ्य से यह सृष्टि रची है ॥१६॥
टिप्पणी: १६−(केन) सामर्थ्येन (आपः) अपः। जलानि (अनु) निरन्तरम् (अतनुत) विस्तारितवान् (केन) (अहः) दिनम् (अकरोत्) अरचयत् (रुचे) दीप्तये (उषसम्) प्रभातवेलाम् (केन) (अनु) अनुक्रमेण (ऐन्द्ध) ञिइन्धी दीप्तौ-लङ्, अन्तर्गतण्यर्थः। प्रदीपितवान् (केन) (सायंभवम्) सायंकालसत्ताम् (ददे) दत्तवान् ॥
