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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ईश्वर शक्ति की महिमा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यया) जिस [शक्ति] करके (द्यौः) सूर्य, (यया) जिस करके (पृथिवी) पृथिवी और (यया) जिस करके (इमाः) यह (आपः) प्रजाएँ (गुपिताः) रक्षित हैं, (सहस्रधाराम्) सहस्रों पदार्थों की धारण करनेवाली (वशाम्) [उस] वशा [कामनायोग्य परमेश्वरशक्ति] को (ब्रह्मणा) वेद द्वारा (अच्छावदामसि) हम आदर से बुलाते हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - हम लोग वेद द्वारा परमेश्वर की सर्वरक्षक शक्ति को यथावत् जानकर अपना सामर्थ्य बढ़ावें ॥४॥
टिप्पणी: ४−(यया) शक्त्या (द्यौः) सूर्यः (पृथिवी) (आपः) आप्ताः प्रजाः-दयानन्दभाष्ये, यजु० ६।२७ (गुपिताः) रक्षिताः (इमाः) दृश्यमानाः (वशाम्) म० २। कमनीयां परमात्मशक्तिम् (सहस्रधाराम्) अ० ७।१५।१। असंख्यपदार्थानां धरित्रीम् (ब्रह्मणा) वेदद्वारा (अच्छावदामसि) अ० ७।३८।३। सत्कारेणाह्वयामः। अन्यद् गतम् ॥
