पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ईश्वर शक्ति की महिमा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (वशायाः) वशा [कामनायोग्य परमेश्वरशक्ति] का (रेतः) वीर्य [वा सामर्थ्य] (चतुर्धा) चार प्रकार पर (अभवत्) हुआ है। (आपः) व्यापक तन्मात्राएँ (तुरीयम्) एक चौथाई, (अमृतम्) अमृत [अमरपन] (तुरीयम्) एक चौथाई, (यज्ञः) यज्ञ [संगति किया हुआ संसार] (तुरीयम्) एक चौथाई और (पशवः) दृष्टिवाले [सब प्राणी] (तुरीयम्) एक चौथाई खण्ड हैं ॥२९॥
भावार्थभाषाः - ईश्वरशक्ति चार प्रकार से प्रकट है−एक सूक्ष्म तन्मात्राओं में, दूसरे उनके अमृत अर्थात् अविनाश में, तीसरे संगतिकरण व्यवहार अर्थात् पृथवी सूर्य आदि की रचना में, और चौथे चराचर प्राणियों की पालन-पोषण क्रिया में ॥२९॥
टिप्पणी: २९−(चतुर्धा) चतुष्प्रकारेण (रेतः) वीर्यम्। सामर्थ्यम् (अभवत्) आसीत् (वशायाः) कमनीयायाः परमेश्वरशक्तेः (आपः) व्यापिकास्तन्मात्राः-दयानन्दभाष्ये, यजुः २७।२५ (तुरीयम्) चतुर्थं खण्डम् (अमृतम्) अमरणम् अविनाशः (यज्ञः) संगतिकरणव्यवहारः संसारः (पशवः) दृष्टिमन्तः प्राणिनः। अन्यद् गतम् ॥
