पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ईश्वर शक्ति की महिमा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (वशा) वशा [कामनायोग्य परमेश्वरशक्ति] ने (यज्ञम्) यज्ञ [संगतियोग्य संसार] को (प्रति अगृह्णात्) ग्रहण कर लिया है, (वशा) वशा ने (सूर्यम्) सूर्य को (अधारयत्) धारण किया है। (वशायाम् अन्तः) वशा के भीतर (ओदनः) सींचनेवाले [मेघ] ने (ब्रह्मणा सह) अन्न के साथ (अविशत्) प्रवेश किया है ॥२५॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर की ही शक्ति में यह सब संसार सूर्य आदि लोकों और सब पालन साधनों सहित वर्तमान है ॥२५॥
टिप्पणी: २५−(वशा) कमनीया परमेश्वरशक्तिः (यज्ञम्) संगन्तव्यं संसारम् (प्रत्यगृह्णात्) प्रत्यक्षं स्वीकृतवती (वशा) (सूर्यम्) (अधारयत्) धृतवती (वशायाम्) परमेश्वरशक्तौ (अन्तः) मध्ये (अविशत्) प्रविष्टवान् (ओदनः) अ० ९।५।१९। सेचकः। मेघः-निघ० १।१०। (ब्रह्मणा) अन्नेन-निघ० २।७। (सह) ॥
