पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ईश्वर शक्ति की महिमा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (वशा) वशा [कामनायोग्य परमेश्वरशक्ति] (राजन्यस्य) शासनकर्ता की (माता) माता [निर्मात्री], और (स्वधे) हे अन्न ! (वशा) वशा (तव) तेरी (माता) माता [जननी] है। (यज्ञे) यज्ञ [श्रेष्ठ कर्म] में (वशायाः) वशा [कामनायोग्य परमेश्वरशक्ति] का (आयुधम्) जीवनधारक कर्म है। (ततः) उससे (चित्तम्) चित्त [विचार सामर्थ्य] (अजायत) उत्पन्न हुआ है ॥१८॥
भावार्थभाषाः - ईश्वरशक्ति के ज्ञान से मनुष्य को शासनशक्ति, अन्नप्राप्ति, जीवनधारण और विचारसामर्थ्य होता है ॥१८॥
टिप्पणी: १८−(वशा) कमनीया परमेश्वरशक्तिः (माता) निर्मात्री (राजन्यस्य) अ० ५।१७।९। ऐश्वर्यवतः। शासकस्य (स्वधे) हे अन्न (वशायाः) परमेश्वरशक्तेः (यज्ञे) श्रेष्ठकर्मणि (आयुधम्) आयु+डुधाञ् धारणपोषणयोः-क। जीवनधारकं कर्म (ततः) तस्याः। वशायाः सकाशात् (चित्तम्) ज्ञानम् (अजायत) अन्यद् गतम् ॥
