127 बार पढ़ा गया
तद्भ॒द्राः सम॑गच्छन्त व॒शा देष्ट्र्यथो॑ स्व॒धा। अथ॑र्वा॒ यत्र॑ दीक्षि॒तो ब॒र्हिष्यास्त॑ हिर॒ण्यये॑ ॥
पद पाठ
यत् । भद्रा: । सम् । अगच्छन्त । वशा । देष्ट्री । अथो इति । स्वधा । अथर्वा । यत्र । दीक्षित: । बर्हिषि । आस्त । हिरण्यये ॥१०.१७॥
अथर्ववेद » काण्ड:10» सूक्त:10» पर्यायः:0» मन्त्र:17
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ईश्वर शक्ति की महिमा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तत्) वहाँ (भद्राः) श्रेष्ठ गुण (सम् अगच्छन्त) मिले हैं, और (देष्ट्री) शासन करनेवाली (वशा) वशा [कामनायोग्य परमेश्वरशक्ति] (अथो) और (स्वधा) अन्न [मिले हैं]। (यत्र) जहाँ (दीक्षितः) नियमवान् (अथर्वा) निश्चल परमात्मा (हिरण्यये) तेजोमय (बर्हिषि) वृद्धि के बीच (आस्त) बैठा है ॥१७॥
भावार्थभाषाः - विज्ञानी पुरुष अनन्त श्रेष्ठ गुणों और अन्न आदि को परमेश्वर की शक्ति के साथ पाकर परमात्मा की महिमा को ध्यान में रखते हैं ॥१७॥ इस मन्त्र का दूसरा भाग−म० १२ में आ चुका है ॥
टिप्पणी: १७−(तत्) तत्र (भद्राः) शुभगुणाः (सम् अगच्छन्त) संगतवन्तः (देष्ट्री) आदेष्ट्री। शासिका (अथो) अपि च (स्वधा) अन्नम्-निघ० २।७। अन्यत् पूर्ववत्−म० १२ ॥
