पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ईश्वर शक्ति की महिमा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ऋतावरि) हे सत्यशील ! (यत्) जब (हिरण्येन) तेज वा पराक्रम से (अभिवृता) घिरी हुई तू (अतिष्ठः) खड़ी हुई, (वशे) हे वशा ! [कामनायोग्य परमेश्वरशक्ति] (समुद्रः) [प्राणियों के अच्छे प्रकार चलने का आधार] परमेश्वर (अश्वः) व्यापक (भूत्वा) होकर (त्वा) तुझको (अधि) अधिकारपूर्वक (अस्कन्दत्) प्राप्त हुआ ॥१६॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर अपनी शक्ति को अपने वश में रखकर यथासमय उसका प्रकाश करता है ॥१६॥
टिप्पणी: १६−(अभिवृता) वेष्टिता (हिरण्येन) तेजसा वीर्येण वा (यत्) यदा (अतिष्ठः) स्थितवती (ऋतावरि) म० ९। सत्यशीले (अश्वः) अशूप्रुषिलटि०। उ० १।१५१। अशू व्याप्तौ-क्वन्। व्यापकः (समुद्रः) समभिद्रवन्त्येनं भूतानि। समुद्र आदित्यः समुद्र आत्मा-निरु० १४।१६। सर्वभूतगमनाधारः परमात्मा (भूत्वा) (अधि) अधिकारपूर्वकम् (अस्कन्दत्) स्कन्दिर् गतिशोषणयोः। प्राप्तवान् (वशे) (त्वा) ॥
