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सं हि सूर्ये॑णागत॒ समु॒ सर्वे॑ण॒ चक्षु॑षा। व॒शा स॑मु॒द्रमत्य॑ख्यद्भ॒द्रा ज्योतीं॑षि॒ बिभ्र॑ती ॥
पद पाठ
सम् । हि । सूर्येण । अगत । सम् । ऊं इति । सर्वेण । चक्षुषा । वशा । समुद्रम् । अति । अख्यत् । भद्रा । ज्योतींषि । बिभ्रती ॥१०.१५॥
अथर्ववेद » काण्ड:10» सूक्त:10» पर्यायः:0» मन्त्र:15
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ईश्वर शक्ति की महिमा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (भद्रा) उत्तम (ज्योतींषि) ज्योतियों को (बिभ्रती) रखती हुई (वशा) वशा [कामनायोग्य परमेश्वरशक्ति] (हि) ही (सूर्येण) सूर्य के साथ (उ) और (सर्वेण) प्रत्येक (चक्षुषा) दृष्टि के साथ (सम् सम् अगत) निरन्तर मिली है और उसने (समुद्रम्) अन्तरिक्ष को (अति) अत्यन्त करके (अख्यत्) प्रकाशित किया है ॥१५॥
भावार्थभाषाः - ईश्वर की शक्ति से ही सूर्य में, और सूर्य द्वारा आँख में और अन्तरिक्ष के सब लोकों को प्रकाश पहुँचता है ॥१५॥
टिप्पणी: १५−(सूर्येण) सूर्यमण्डलेन (चक्षुषा) दर्शनशक्त्या (अति) अत्यन्तम् (अख्यत्) चक्षिङ् व्यक्तायां वाचि दर्शने च। प्रकाशितवती (भद्रा) श्रेष्ठानि (ज्योतींषि) प्रकाशान्। अन्यत् पूर्ववत् ॥
