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देवता: वशा ऋषि: कश्यपः छन्द: अनुष्टुप् स्वर: वशागौ सूक्त

सं हि वाते॒नाग॑त॒ समु॒ सर्वैः॑ पत॒त्रिभिः॑। व॒शा स॑मु॒द्रे प्रानृ॑त्य॒दृचः॒ सामा॑नि॒ बिभ्र॑ती ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सम् । हि । वातेन । अगत । सम् । ऊं इति । सर्वै: । पतत्रिऽभि: । वशा । समुद्रे । प्र । अनृत्यत् । ऋच: । सामानि । बिभ्रती ॥१०.१४॥

अथर्ववेद » काण्ड:10» सूक्त:10» पर्यायः:0» मन्त्र:14


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ईश्वर शक्ति की महिमा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (ऋचः) स्तुतियोग्य [वेदवाणियों] और (सामानि) मोक्षज्ञानों को (बिभ्रती) रखती हुई (वशा) वशा [कामनायोग्य परमेश्वरशक्ति] (हि) ही (वातेन) वायु से (उ) और (सर्वैः) सब (पतत्रिभिः) पक्षियों से (सम् सम् अगत) निरन्तर मिली है, और उसने (समुद्रे) अन्तरिक्ष में (प्र) अच्छे प्रकार (अनृत्यत्) अङ्ग फड़काए हैं ॥१४॥
भावार्थभाषाः - ईश्वरशक्ति ईश्वरवाणी को मानती हुई वायु, पक्षियों और सब लोकों को अन्तरिक्ष में चलाती हुई विराजमान है ॥१४॥
टिप्पणी: १४−(वातेन) वायुना (सम् सम् अगत) म० १३। निरन्तरं संगतवती (सर्वैः) समस्तैः (पतत्रिभिः) पक्षिभिः (समुद्रे) अन्तरिक्षे (प्र) प्रकर्षेण (अनृत्यत्) अङ्गानि विक्षिप्तवती (ऋचः) स्तुत्या वेदवाणीः (सामानि) अ० ७।५४।१। मोक्षज्ञानानि (बिभ्रती) धारयन्ती। अन्यत् पूर्ववत् ॥