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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ईश्वर शक्ति की महिमा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (वशा) वशा [कामनायोग्य परमेश्वरशक्ति] (हि) ही (सोमेन) ऐश्वर्य के साथ (उ) और (सर्वेण) प्रत्येक (पद्वता) पाँववाले [चलते-फिरते पुरुषार्थी] के साथ (सम् सम् अगत्) निरन्तर संयुक्त हुई है, और (गन्धर्वैः) पृथिवी धारण करनेवाले और (कलिभिः सह) गणना करनेवाले [गुणों] के साथ (समुद्रम्) अन्तरिक्ष की (अधि अस्थात्) अधिष्ठात्री हुई है ॥१३॥
भावार्थभाषाः - प्रत्येक पुरुषार्थी जीव अपने पुरुषार्थ के अनुसार ईश्वरशक्ति से फल पाता है ॥१३॥
टिप्पणी: १३−(हि) निश्चयेन (सोमेन) ऐश्वर्येण (सम् सम् अगत्) अभ्यासे भूयांसमर्थं मन्यन्ते-निरु० १०।४२। समो गम्यृच्छिप्रच्छि०। पा० १।३।२९। आत्मनेपदम्। मन्त्रे घसह्वरणश०। पा० २।४।८०। च्लेर्लुक्। अनुदात्तोपदेशवनतितनोत्यादीनाम०। पा० ६।४।३७। अनुनासिकलोपः। निरन्तरं संगतवती (उ) च (सर्वेण) प्रत्येकेन (पद्वता) पदयुक्तेन। गतिशीलेन (वशा) म० २। (समुद्रम्) अन्तरिक्षम् (अध्यष्ठात्) अधिकृतवती (गन्धर्वैः) अ० २।१।२। पृथिवीधारकैर्गुणैः (कलिभिः) सर्वधातुभ्य इन्। उ० ४।११८। कल गतौ संख्याने च। गणकैर्गुणैः (सह) ॥
