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नम॑स्ते॒ जाय॑मानायै जा॒ताया॑ उ॒त ते॒ नमः॑। बाले॑भ्यः श॒फेभ्यो॑ रू॒पाया॑घ्न्ये ते॒ नमः॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

नम: । ते । जायमानायै । जातायै । उत । ते । नम: । बालेभ्य: । शफेभ्य: । रूपाय । अघ्न्ये । ते । नम: ॥१०.१॥

अथर्ववेद » काण्ड:10» सूक्त:10» पर्यायः:0» मन्त्र:1


पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ईश्वर शक्ति की महिमा का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (ते जायमानायै) तुझ प्रकट होती हुई को (नमः) नमस्कार (उत) और (ते जातायै) तुझ प्रकट हो चुकी को (नमः) नमस्कार है। (अघ्न्ये) हे न मारनेवाली [परमेश्वरशक्ति !] (बालेभ्यः) बलों के लिये और (शफेभ्यः) शान्तिव्यवहारों के लिये (ते) तेरे (रूपाय) स्वरूप [फैलाव] को (नमः) नमस्कार है ॥१॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर के जिन गुणों को बुद्धिमान् लोग जानते जाते हैं और जिनको जान चुके हैं, विवेकी जन उन अद्भुत गुणों को साक्षात् करके बल वृद्धि और शान्तिप्रचार के लिये परमेश्वर को सदा नमस्कार करें ॥१॥
टिप्पणी: १−(नमः) सत्कारः (ते) तुभ्यम् (जायमानायै) उत्पद्यमानायै (जातायै) पूर्वकालात् प्रसिद्धायै (उत) अपि (बालेभ्यः) बल प्राणने धान्यावरोधने च-घञ्। नानाबलेभ्यः (शफेभ्यः) अ० ९।७।१०। शम शान्तौ-अच्, मस्य फः। शान्तिव्यवहाराणां सिद्धये (रूपाय) स्वरूपाय। विस्ताराय (अघ्न्ये) अ० १०।९।३। नञ्+हन हिंसागत्योः-यक्, टाप्। हे अहिंसिके रक्षिके। परमेश्वरशक्ते। अन्यद् गतम् ॥