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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के कर्तव्य दण्ड का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे हिंसा क्रिया !] (यः) जिस [शत्रु] ने (ते) तेरे (परूंषि) जोड़ों को (सन्दधौ) जोड़ा था, (इव) जैसे (ऋभुः) बुद्धिमान् [शिल्पी] (रथस्य) रथ के [जोड़ों को] (धिया) अपनी बुद्धि से (तम्) उसको (गच्छ) पहुँच, (तत्र) वहाँ पर (ते) तेरा (अयनम्) घर है, (अयम्) यह (जनः) पुरुष (ते) तेरा (अज्ञातः) अनजान [होवे] ॥८॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य प्रपञ्च रचकर प्रजा जनों को गुप्त रीति से सतावें, उन्हें दण्ड दिया जावे ॥८॥
टिप्पणी: ८−(यः) शत्रुः (ते) तव (परूंषि) अवयवान् (संदधौ) संयोजितवान् (रथस्य) (इव) (ऋभुः) अ० १।२।३। मेधावी-निघ० ३।१५। शिल्पी (धिया) बुद्ध्या (तम्) शत्रुम् (गच्छ) प्राप्नुहि (तत्र) (ते) तव (अयनम्) गृहम् (अज्ञातः) अपरिचितः (अयम्) (जनः) ॥
