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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के कर्तव्य दण्ड का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अघम्) बुराई (अघकृते) बुराई करनेवाले को और (शपथः) शाप (शपथीयते) शाप करनेवाले को (अस्तु) होवे। [उस दुष्ट कर्म को] (प्रत्यक्) पीछे की ओर (प्रतिप्रहिण्मः) हम हटा देते हैं (यथा) जिस से [वह दुष्ट कर्म] (कृत्याकृतम्) हिंसा करनेवाले को (हनत्) मारे ॥५॥
भावार्थभाषाः - दुष्कर्मी कटुभाषी दुष्ट को यथानीति दण्ड दिया जावे ॥५॥
टिप्पणी: ५−(अघम्) पापम् (अस्तु) (अघकृते) पापकारिणे (शपथः) शापः। दुर्वचनम् (शपथीयते) शपथ-क्यच्, शतृ। शापकारिणे (प्रत्यक्) प्रतिकूलगमनम् (प्रतिप्रहिण्मः) हि गतिवृद्ध्योः। प्रतिकूलं गमयामः (यथा) येन प्रकारेण (कृत्याकृतम्) हिंसाकारिणम् (हनत्) हन्यात् ॥
