0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के कर्तव्य दण्ड का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (शीर्षण्वती) शिरसम्बन्धी, (नस्वती) नाकसम्बन्धी, (कर्णिनी) कानसम्बन्धी [जो हिंसा क्रिया] (कृत्याकृता) हिंसा करनेवाले पुरुष द्वारा (संभृता) साधी गई (विश्वरूपा) अनेक रूपवाली है, (सा) वह (आरात्) दूर (एतु) चली जावे, (एनाम्) इसको (अप नुदामः) हम हटाते हैं ॥२॥
भावार्थभाषाः - प्रजा के शरीरों को कष्ट देनेवाले उत्पातियों को यथावत् दण्ड दिया जावे ॥२॥
टिप्पणी: २−(शीर्षण्वती) तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप्। पा० ५।२।९४। शिरःसम्बन्धिनी (नस्वती) नासासम्बन्धिनी (कर्णिनी) श्रोत्रसंबन्धिनी हिंसा (कृत्याकृता) अ० ४।९।५। कृञ् हिंसायाम्-क्यप्, तुक्+डुकृञ् करणे-क्विप्, तुक्। हिंसाकारकेण (संभृता) निष्पादिता (विश्वरूपा) अनेकविधा। इतरत् पूर्ववत्−म० १ ॥
