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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के कर्तव्य दण्ड का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (याम्) जिस (विश्वरूपाम्) अनेक रूपवाली, (हस्तकृताम्) हाथों से की हुई [हिंसा क्रिया] को (चिकित्सवः) संशय करनेवाले लोग (कल्पयन्ति) बनाते हैं, (इव) जैसे (वधूम्) वधू को (वहतौ) विवाह में, (सा) वह (आरात्) दूर (एतु) चली जावे, (एनाम्) इसको (अपनुदामः) हम हटाते हैं ॥१॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य छल करके देखने में सुखद और भीतर से दुःखदायी काम करें, राजा उसका यथावत् प्रतीकार करे ॥१॥
टिप्पणी: १−(याम्) कृत्याम्। हिंसाक्रियाम् (कल्पयन्ति) रचयन्ति। संस्कुर्वन्ति (वहतौ) अ० ३।३१।५। वह-चतु। विवाहे (वधूम्) अ० १।१।२। नवोढां जायाम् (इव) यथा (विश्वरूपाम्) अनेकविधाम् (हस्तकृताम्) हस्तेन निष्पादिताम् (चिकित्सवः) कित संशये रोगापनयने च−स्वार्थे सन्, उ प्रत्ययः। संशयशीलाः (सा) हिंसाक्रिया (आरात्) दूरे (एतु) गच्छतु (अप नुदामः) दूरे प्रेरयामः (एनाम्) हिंसाक्रियाम् ॥
