सब सम्पत्तियों के लिये प्रयत्न का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (जातवेदः) हे विज्ञानयुक्त, परमेश्वर ! तूने (येन उत्तमेन ब्रह्मणा) जिस उत्तम वेदविज्ञान से (इन्द्राय) पुरुषार्थी जीव के लिये (पयांसि) दुग्धादि रसों को (समभरः) भर रक्खा है। (तेन) उसी से (अग्ने) हे ज्ञानस्वरूप परमेश्वर ! (त्वम्) तू (इह) यहाँ पर (इमम्) इसे (मुझे) (वर्धय) वृद्धियुक्त कर, (सजातानाम्) तुल्य जन्मवाले पुरुषों में (श्रैष्ठ्ये) श्रेष्ठ पद पर (एनम्) इसको [मुझको] (आ) यथाविधि (धेहि) स्थापित कर ॥३॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर पुरुषार्थियों को सदा पुष्ट और आनन्दित करता है। मनुष्य को प्रयत्न करके अपनी श्रेष्ठता और प्रतिष्ठा बढ़ानी चाहिये ॥३॥ (अग्नि) शब्द ईश्वरवाची है। इस में यह प्रमाण है−मनु १२।१२३। एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम्। इन्द्रमेकेऽपरे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम् ॥१॥ इसको कोई अग्नि, दूसरे मनु और प्रजापति, कोई इन्द्र, दूसरे प्राण और नित्य ब्रह्म कहते हैं ॥