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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सेनापति के लक्षण।
पदार्थान्वयभाषाः - (सोमप) हे अमृत पीने हारे [राजन्] ! तू (यातुधानस्य) पीडा देनेहारे पुरुष के (प्रजाम्) मनुष्यों को (जहि) मार, (च) और (नयस्व) ले आ। (निस्तुवानस्य) अपस्तुति [निन्दा] करते हुए [शत्रु की] (परम्) उत्तम [हृदय की] (उत) और (अवरम्) नीची [शिर की] (अक्षि) आँख को (पातय) निकाल दे ॥३॥
भावार्थभाषाः - (सोमप) अमृत पीने हारा अर्थात् शान्तस्वभाव यशस्वी राजा दुष्टों का नाश करे और पकड़ लावे। निन्दा फैलाने हारे मिथ्याचारी शत्रु को नष्ट भ्रष्ट कर दे कि वह पापी अपने मन के भीतरी कुविचार और बाहिरी कुचेष्टा और पाप कर्म छोड़ दे ॥३॥
टिप्पणी: ३−यातु-धानस्य। १।७।१। पीडाप्रदस्य। सोम-प। आतोऽनुपसर्गे कः। पा० ३।२।३। इति सोम+पा पाने-क। हे अमृतस्य पातः। जहि। हन हिंसागत्योः−लोट्। नाशय। प्र-जाम्। जनम्। मनुष्यान्। नयस्व। आनय। निः। क्षेपेण, अपवादेन। निषेधेन। स्तुवानस्य। म० २। स्तुवतः शत्रोः। पातय। पत अधोगतौ-णिच् लोट्। अधोगमय, च्यावय। परम्। ॠदोरप्। पा० ३।३।५७। इति पॄ-पालने पूर्त्तौ च-अप्। श्रेष्ठम्। उच्चम्। अक्षि। अशेर्नित्। उ० ३।१५६। इति अशू व्याप्तौ-क्सि। यद्वा। अक्षू व्याप्तौ-इन्। चक्षुः, नेत्रम्। अवरम्। ग्रहिवृदृनिश्चिगमश्च। पा० ३।३।५८। इति न+वृञ् वरणे-अप्। न व्रियत इति। निकृष्टम्, नीचम् ॥
