पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सेनापति के लक्षण।
पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे अग्नि ! (त्वम्) तू (उप बद्धान्) दृढ़ बाँधे हुए (यातुधानान्) दुःखदायी राक्षसों को (इह) यहाँ पर (आवह) ले आ। (अथ) और (इन्द्रः) वायु (वज्रेण) कुल्हाड़े से (एषाम्) इनके (शीर्षाणि) मस्तकों को (अपि) भी (व्रश्चतु) काट डाले ॥७॥
भावार्थभाषाः - अग्नि के समान प्रतापी और (इन्द्र) वायु के समान वेगवान् राजा उत्पातियों को कारागार में डाल दे और उनके सिर उड़ा दे ॥ इसी प्रकार सब मनुष्य अध्यात्म विषय में आत्मा को सेनानी, और लोभ, मोह, आदि को शत्रु और गृहस्थिति में गृहपति को सेनापति और विघ्नों को वैरी मान कर योग्य व्यवहार करें ॥
टिप्पणी: ७−यातु-धानान्। म० १ पीडाप्रदान्। उप-बद्धान्। बन्ध बन्धने-क्त-दृढबन्धनयुक्तान्। इह। निपातस्य च। पा० ६।३।१३६। इति दीर्घः। अत्र। अथ। च। तदनन्तरम्। एषाम्। यातुधानानाम्। इन्द्रः। १।२।३। वायुः। वायुवद् वेगवान्। परमैश्वर्यवान् ॥ वज्रेण। ऋज्रेन्द्राग्रवज्रविप्र०। उ० २।२८। इति वज गतौ-रन्। कुलिशेन, कुठारेण। अपि। एव अवश्यम्। शीर्षाणि। शीर्षंश्छन्दसि। पा० ६।१।६०। इति शिरःशब्दस्य शीर्षम् आदेशः। शिरांसि, मस्तकानि। वृश्चतु। ओव्रश्चू छेदने, तुदादित्वात् शः। छिनत्तु ॥
