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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सेनापति के लक्षण।
पदार्थान्वयभाषाः - (जातवेदः) हे ज्ञान वा धन देनेवाले राजन् ! (आरभस्व) वैरियों को पकड़ ले, (अस्माक) हमारे (अर्थाय) प्रयोजन के लिये (जज्ञिषे) तू उत्पन्न हुआ है। (अग्ने) हे अग्ने [सेनापते] (नः) हमारा (दूतः) दूत (भूत्वा) होकर (यातुधानान्) दुःखदायियों से (विलापय) विलाप करा ॥६॥
भावार्थभाषाः - (दूत) का अर्थ शीघ्रगामी और सन्तापकारी है, जैसे दूत शीघ्र चल कर संदेश पहुँचाता है, वैसे ही बिजुलीरूप अग्नि शरीरों में प्रविष्ट होकर वेग उत्पन्न करता है अथवा काष्ठ आदि को जलाता है, इसी प्रकार अग्नि के समान तेजस्वी और प्रतापी राजा अपनी प्रजा की दशा को जान कर यथोचित न्याय करता और दुष्टों को दण्ड देता है ॥६॥
टिप्पणी: ६−आ+रभस्व। मं० ४। आङ्+रभ स्पर्शे-लोट्। निगृहाण। जातवेदः। मं० २। जातप्रज्ञान ! अस्माक। अन्त्यलोपश्छान्दसः। अस्माकम्। अर्थाय। अर्थ याचने-घञ्। प्रयोजनाय, धनाय। जज्ञिषे। जनी प्रादुर्भावे लिट्, त्वं जातवानसि। दूतः। दुतनिभ्यां दीर्घश्च। उ० ३।९०। इति दु गतौ-क्त। यद्वा टुदु उपतापे-क्त दीर्घश्च। दवति गच्छति दुनोत्युपतापयतीति दूतः। वार्त्ताहरः, सन्देशहरः। संतापकः। अग्निः। अग्ने। अग्निवत् तेजस्विन् राजन्। यातु-धानान्। म० १। पीडाप्रदान्। विलापय। म० २। विलापयुक्तान् कुरु, रोदय ॥
