सुवर्ण आदि धन प्राप्ति के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (न) न तो (रक्षांसि) हिंसा करनेहारे राक्षस और (न) न (पिशाचाः) मांसाहारी पिशाच (एनम्) इस पुरुष को (सहन्ते) दबा सकते हैं, (हि) क्योंकि (एतत्) यह [विज्ञान वा सुवर्ण] (देवानाम्) विद्वानों का (प्रथमजम्) प्रथम उत्पन्न (ओजः) सामर्थ्य है। (यः) जो पुरुष (दाक्षायणम्) बल की गति बढ़ानेवाले (हिरण्यम्) कमनीय तेजःस्वरूप विज्ञान वा सुवर्ण को (बिभर्ति) धारण करता है, (सः) वह (जीवेषु) सब जीवों में (आयुः) अपनी आयु को (दीर्घम्) दीर्घ (कृणुते) करता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - जो पुरुष (प्रथमजम्) प्रथम अवस्था में गुणी माता, पिता और आचार्य से ब्रह्मचर्यसेवन करके शिक्षा पाते हैं, वह उत्साही जन सब विघ्नों को हटा कर दुष्ट हिंसकों के फंदे में नहीं फँसते हैं और वही सत्कर्मी पुरुष विज्ञान और सुवर्ण आदि धन को प्राप्त करके संसार में यश पाते हैं, इसी का नाम दीर्घ आयु करना है ॥२॥ यह मन्त्र कुछ भेद से यजुर्वेद में है, अ० ३४ म० ५१ ॥