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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विद्या की प्राप्ति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (परितत्नुना) बहुत फैली हुई (इक्षुणा) लालसा के साथ [अथवा, ऊख जैसी मधुरता के साथ] (अविद्विषे) वैर छोड़ने के लिये (त्वा) तुझको (परि) सब ओर से (अगाम्) मैंने पाया है। (यथा) जिससे तू (माम् कामिनी) मेरी कामना करनेवाली (असः) होवे और (यथा) जिससे तू (मत्) मुझसे (अपगाः) बिछुड़नेवाली (न) न (असः) होवे ॥५॥
भावार्थभाषाः - जब ब्रह्मचारी पूर्ण अभिलाषा से विद्या के लिये प्रयत्न करता है, तो कठिन से कठिन भी विद्या उसको अवश्य मिलती और अभीष्ट आनन्द देती है ॥५॥ इस मन्त्र का दूसरा आधा २।३०।१ और ६।८।१-३ में भी है ॥
टिप्पणी: ५−परि। सर्वतोभावेन। त्वा। त्वाम् मधुलतां विद्याम्। परि-तत्नुना। दाभाभ्यां नुः। उ० ३।३२। इति बाहुलकात्। तनु विस्तारे−नु प्रत्ययः। सर्वत्रव्याप्तेन। इक्षुणा। इषेः वसुः। उ० ३।१५७। इति इषु इच्छायाम्−क्सु। अभिलाषेण, यद्वा। गुडतृणेन प्रेमरूपेण। अगाम्। इण् गतौ−लुङ्। प्राप्तवानस्मि। अवि-द्विषे। न+वि+द्विष वैरे−भावे क्विप्। वैरत्यागार्थम्। यथा। येन प्रकारेण। माम्। ब्रह्मचारिणम्। कामिनी। अत इनिठनौ। पा० ५।२।११५। इति काम−इनि। ङीप्। अकेनोर्भविष्यदाधमर्ण्ययोः। पा० २।३।७०। इति द्वितीया। माम् कामयमाना। असः। १।१६।४। त्वम् भवेः, भूयाः। मत्। मत्तः। न। निषेधे। अप-गाः। आतो मनिन्क्वनिब्वनिपश्च। पा० ३।२।७४। इति अप+गाङ् गतौ−विच्। अपयानशीला, प्रस्थानशीला, वियोगिनी ॥
