सूक्ष्म तन्मात्राओं का विचार।
पदार्थान्वयभाषाः - (देवाः) सब प्रकाशमय पदार्थ (दिवि) व्यवहार के योग्य आकाश में (यासाम्) जिनका (भक्षम्) भोजन (कृण्वन्ति) करते हैं और (याः) जो [तन्मात्राएँ] (अन्तरिक्षे) सबके मध्यवर्ती आकर्षण में (बहुधा) अनेक रूपों से (भवन्ति) वर्त्तमान हैं और (याः) जिन (सुवर्णाः) सुन्दर रूपवाली (आपः) तन्मात्राओं ने (अग्निम्) [बिजुली] रूप अग्नि को (गर्भम्) गर्भ के समान (दधिरे) धारण किया था, (ताः) वो [तन्मात्राएँ] (नः) हमारे लिये (शम्) शुभ करनेहारी और (स्योनाः) सुख देनेवाली (भवन्तु) होवें ॥३॥
भावार्थभाषाः - अपरिमित तन्मात्राएँ ईश्वरकृत परस्पर आकर्षण से संसार के (देवाः) सूर्य, अग्नि, वायु आदि सब पदार्थों के धारण और पोषण का कारण हैं। (देवाः) विद्वान् लोग इनके सूक्ष्म विचार से संसार में अनेक उपकार करके सुख पाते हैं ॥३॥