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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविचार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अन्तरिक्षे) सबके भीतर दिखाई देनेहारे आकाशरूप परमेश्वर में (आसाम्) इनका [लतारूप सृष्टियों का] (स्थाम) ठहराव है (श्रान्तसदाम् इव) जैसे थक कर बैठे हुए यात्रियों का पड़ाव। (वेधसः) बुद्धिमान् लोग (तत्) उस ब्रह्म को (अस्य भूतस्य) इस संसार का (आस्थानम्) आश्रय (विदुः) जानते हैं, (वा) अथवा (न) नहीं [जानते हैं] ॥२॥
भावार्थभाषाः - सूर्य आदि असंख्य लोक उसी परमब्रह्म में ठहरे हैं, वही समस्त जगत् का केन्द्र है। इस बात को विद्वान् लोग विधि और निषेधरूप विचार से निश्चित करते हैं, जैसे ब्रह्म जड़ नहीं है, किन्तु चैतन्य है, इत्यादि, अथवा जितना अधिक ब्रह्मज्ञान होता जाता है, उतना ही वह अनन्त, ब्रह्म अगम्य और अति अधिक जान पड़ता है, इससे वह ब्रह्मज्ञानी अपने को अज्ञानी समझते हैं ॥२॥
टिप्पणी: २−अन्तरिक्षे। १।३०।३। सर्वमध्ये दृश्यमाने परमेश्वरे। आसाम्। वीरुधाम्। म० १। विरोहणशीलानां पदार्थानाम्। स्थाम। सर्वधातुभ्यो मनिन्। उ० ४।१४४। ष्ठा गतिनिवृत्तौ−मनिन्। स्थानं। स्थितिः। श्रान्तसदाम्। श्रमु तपःखेदयोः−भावे क्त+षद्लृ विशरणगत्यवसादनेषु−क्विप्। श्रमेण मार्गस्वेदेन स्थितानाम्। आ-स्थानम्। आ+ष्ठा−ल्युट्। स्थानम्। आश्रयम्। अस्य। परिदृश्यमानस्य। भूतस्य। लोकस्य, जगतः। विदुः। विद ज्ञाने−लट्। विदन्ति जानन्ति। तत्। कारणभूतं ब्रह्म। वेधसः। १।११।१। मेधाविनः, विद्वांसः। न। निषेधे। वा। अथवा ॥
