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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शान्ति के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ते) तेरे (मेहनम्) मूत्रद्वार को (प्रभिनद्मि) मैं खोले देता हूँ, (इव) जैसे (वेशन्त्याः) झील का पानी (वर्त्रम्) बन्ध को [खोल देता है]। (एव), वैसे ही.... म. ६ ॥७॥
भावार्थभाषाः - जैसे सद्वैद्य लोह शलाका से रोगी के रुके हुए मूत्र को झील के पानी के समान खोलकर निकाल देता है, वैसे ही मनुष्य अपने शत्रु को निकाल देवे ॥७॥
टिप्पणी: ७−प्र+भिनद्मि। भिदिर् विदारणे−लट्। व्यवहिताश्च। पा० १।४।८२। इति उपसर्गस्य व्यवधानम्। विवृणोमि, विवृतं करोमि। मेहनम्। मिह सेचने करणे ल्युट्। मेहति सिञ्चति मूत्रम्। मूत्रमार्गम्। वर्त्रम्। सर्वधातुभ्यः ष्ट्रन्। उ० ४।१५९। वृतु वर्तने-ष्ट्रन्। बन्धम्। वेशन्त्याः। जॄविशिभ्यां झच्। उ० ३।१२६। इति विश प्रवेशे-झच्। झोऽन्तः। पा० ७।१।३। इति झस्य अन्तादेशः, वेशन्तः जलाशयः। भवे छन्दसि। पा० ४।४।११०। इति यत्। वेशन्ते सरोवरे भवा आपः। अन्यत् पूर्ववत् मं० ६ ॥
