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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शान्ति के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यत्) जैसे (यत्) कि (आन्त्रेषु) आँतों में और (गवीन्योः) दोनों पार्श्वस्थ नाड़ियों में और (वस्तौ अधि) मूत्राशय के भीतर (संश्रुतम्) एकत्र हुआ [मूत्र छूटता है]। (एव) वैसे ही (ते मूत्रम्) तेरा मूत्र रूप (बाल्) वैरी (बहिः) बाहिर (मुच्यताम्) निकाल दिया जावे (इति सर्वकम्) यही बस है ॥६॥
भावार्थभाषाः - जैसे शरीर में रुका हुआ सारहीन मल विशेष, मूत्र अर्थात् प्रस्राव क्लेश देता है और उस के निकाल देने से चैन मिलता है, वैसे ही मनुष्य आत्मिक, शारीरिक और सामाजिक शत्रुओं के निकाल देने से सुख पाता है ॥६॥
टिप्पणी: टिप्पणी−सायणभाष्य में (संश्रुतम्) के स्थान में (संश्रितम्) मानकरसमवस्थितम् [ठहरा हुआ] अर्थ किया है ॥ ६−यत्। यथा। आन्त्रेषु। अमत्यनेन, अम गतौ-क्त्र,। अति बन्धने−करणे ष्ट्रन्। उपधादीर्घः। अन्त्रेषु, उदरनाडीविशेषेषु। गवीन्योः। द्रुदक्षिभ्यामिनन्। उ० २।५०। इति गुङ् ध्वनौ-इनन्। ङीष्। छान्दसो दीर्घः। पार्श्वद्वयस्थे नाड्यौ गवीन्यौ इत्युच्यते, तयोः−इति सायणः। वस्तौ। वसेस्तिः। उ० ४।१८०। इति वस आच्छादने−ति प्रत्ययः। वसति मूत्रादिकम्। मूत्राशये। अधि। उपरि, मध्ये। सम्-श्रुतम्। श्रु श्रवणे गतौ च-क्त। सम्यक् श्रुतम्। संगतम्। एव। एवम्, तथा। मूत्रम्। मूत्र प्रस्रावे-घञ्। यद्वा, सिविमुच्योष्टेरू च। उ० ४।१६३। इति मुच त्यागे−ष्ट्रन्, ऊत्वं च। मुच्यते त्यज्यते इति। प्रस्रावः, मेहनम्। सारहीनो मलद्रवः। मुच्यताम्। मुच−कर्मणि लोट्। त्यज्यताम्, निर्गच्छतु। सर्वकम्। अव्ययसर्वनाम्नामकच् प्राक् टेः। पा० ५।३।७१। इति अकच्। सर्वम्। अन्यद् व्याख्यातं मं० १ ॥
