0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजतिलकयज्ञ के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (असौ) वह (सूर्यः) लोकों का चलानेहारा सूर्य (उत् अगात्) उदय हुआ है और (इदम्) यह (मामकम्) मेरा (वचः) वचन (उत्=उत् अगात्) उदय हुआ है (यथा) जिससे कि (अहम्) मैं (शत्रुहः) शत्रुओं का मारनेवाला और (सपत्नहा) रिषु दल का नाश करनेवाला होकर (असपत्नः) शत्रुरहित (असानि) रहूँ ॥५॥
भावार्थभाषाः - राजा राजसिंहासन पर विराज कर राजघोषणा करे कि जिस प्रकार पृथिवी पर सूर्य प्रकाशित है, उसी प्रकार से यह राजघोषणा [ढंढोरा] प्रकाशित की जाती है कि राज्य में कोई उपद्रव न मचावे और न अराजकता फैलावे ॥५॥ इस मन्त्र का पूर्वार्ध ऋ० १०।१५९।१। का पूर्वार्ध है, वहाँ (वचः) के स्थान में (भगः) है ॥
टिप्पणी: ५−उत्+अगात्। १।२८।१। उदितवान्। सूर्यः। १।३।५। लोकानां प्रेरकः। आदित्यः। राज्यलक्ष्मीरूपः। उत्=उत् अगात्। इदम्। वक्ष्यमाणं वचनम्। मामकम्। तस्येदम्। पा० ४।३।१२०। इति अस्मद् अण्। तवकममकावेकवचने। पा० ४।३।३। इति ममकादेशः। मदीयम्। वचः। वच कथने−असुन्। वाक्यम् वचनम्। यथा। येन कारणेन। अहम्। राजा। शत्रु-हः। आशिषि हनः। पा० ३।२।४९। इति शत्रु+हन हिंसागत्योः−ड प्रत्ययः। शत्रूणां हन्ता। असानि। अस सत्तायां−लोट्। अहं भवानि। असपत्नः। म० २। शत्रुरहितः। सपत्नहा। क्विप् च। पा० ३।२।७६। इति सपत्न+हन्−क्विप्। रिपुहन्ता ॥
