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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजतिलकयज्ञ के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अभिवर्तः) शत्रुओं का जीतनेवाला और (अभिभवः) हरानेवाला और (सपत्नक्षयणः) प्रतिपक्षियों का नाश करनेवाला (मणिः) मणि [प्रशंसनीय सामर्थ्य] रत्न आदि राज्य चिह्न (मह्यम्) मुझपर (राष्ट्राय) राज्य की वृद्धि के लिये और (सपत्नेभ्यः) वैरियों को (पराभुवे) दबाने के लिये (बध्यताम्) बाँधा जावे ॥४॥
भावार्थभाषाः - राज्यलक्ष्मी का प्रभाव जताने के लिये राजा मणि रत्न आदि को धारण करके अपना सामर्थ्य बढ़ावे और राजसभा में राजसिंहासन पर विराजे कि जिससे शत्रुदल भयभीत होकर आज्ञाकारी बने रहें और राज्य में ऐश्वर्य की सदा वृद्धि होवे ॥४॥
टिप्पणी: ४−अभिवर्तः। म० १। जयशीलः। अभिभवः। अभि+भू−अप् अभिभविता। सपत्न−क्षयणः। नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः। पा० ३।१।१३४। इति सपत्नपूर्वात् क्षि क्षये−कर्तरि ल्यु। शत्रूणां क्षयकरः। मणिः। म० १। रत्नम्। प्रशस्तं सामर्थ्यम्। राष्ट्राय। म० १। राज्यवर्धनाय। मह्यम्। मदर्थम्। बध्यताम्। बन्ध बन्धने, कर्मणि लोट्। धार्यताम्। सपत्नेभ्यः। शत्रुभ्यः। पराभुवे। परा+भू−भावे क्विप्। पराभवनाय ॥
