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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजतिलकयज्ञ के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे ब्रह्मणस्पते] (सपत्नान्) [हमारे] प्रतिपक्षियों को और (याः) जो (नः) हमारी (अरातयः) कर न देनेहारी प्रजाएँ हैं, [उनको] (अभि) सर्वथा (अभिवृत्य) जीतकर (पृतन्यन्तम्) सेना चढ़ा कर लानेवाले शत्रु को [और उस पुरुष को] (यः) जो (नः) हमसे (दुरस्यति) दुष्ट आचरण करे, (अभि) सर्वथा (अभि तिष्ठ) तू दबा ले ॥२॥
भावार्थभाषाः - राजा परमेश्वर पर श्रद्धा करके अपने स्वदेशी और विदेशी दोनों प्रकार के शत्रुओं को यथायोग्य दण्ड देकर वश में रक्खें ॥२॥
टिप्पणी: टिप्पणी−(अरातयः) शब्द का अर्थ ऋ० १०।१७४।२। में सायणाचार्य ने भी अदानशील प्रजा किया है ॥२−अभि-वृत्य। अभि+वृतु−ल्यप्। अभिभूय, पराजित्य। सपत्नान्। १।९।१। प्रतियोगिनः स्वदेशिनः शत्रून्। अभि। अभितः। सर्वथा। याः। ताः याः। अरातयः। १।२।२। अदानशीलाः प्रजाः। इति सायणोऽपि ऋ० १०।१७४।२। अभि+तिष्ठ। अभिभव, पराजय, त्वं ब्रह्मणस्पते। पृतन्यन्तम्। १।३१।२। सुप आत्मनः क्यच्। पा० ३।१।८। इति पृतना क्यच्−शतृ। पृतनाः सेना आत्मानमिच्छन्तं युयुत्सुम्। यः=तम् यः। नः। अस्मान्। दुरस्यति। दुरस्युर्द्रविणस्युर्वृषण्यति रिषण्यति। पा० ७।४।३६। इति क्यचि दुष्टशब्दस्य दुरस् भावो निपात्यते। दुष्टीयति दुष्टम्। अनिष्टं कर्तुमिच्छति ॥
