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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
युद्ध का प्रकरण।
पदार्थान्वयभाषाः - (देव) हे विजयी सेनापति (यातुधानान्) दुःखदायी (किमीदिनः) क्या-क्या करनेहारे छली सूचकों को (प्रति) एक-एक करके (प्रतिदह) जला दे। (कृष्णवर्तने) हे धूँआ-धार मार्गवाले अग्निरूप सेनापति (प्रतीचीः) सन्मुख धावा करती हुयी (यातुधान्यः=०-नीः) दुःखदायिनी शत्रुसेनाओं को (सम् दह) चारों ओर से भस्म कर दे ॥२॥
भावार्थभाषाः - युद्धकुशल सेनापति अपने घातस्थानों से तोप तुपक आदि द्वारा अग्नि के समान धूँआ-धार करता हुआ शत्रुओं के मुखियाओं और सेनादलों को व्याकुल करके भस्म कर देवे ॥२॥ सायणभाष्य में (कृष्णवर्तने) के स्थान में [कृष्णवर्त्मने] पद है और उसका अर्थ [हे कृष्णवर्त्मन्] है ॥
टिप्पणी: २−प्रति। प्रतिमुखम्। प्रत्येकम्। दह। भस्मीकुरु, यातु-धानान्। म० १। पीडादातॄन्, राक्षसान्। देव। म० १। हे विजयशील ! किमीदिनः। म० १। पिशुनान्। प्रतीचीः। ऋत्विग्दधृक्०। पा० ३।३।५९। इति। प्रति+अञ्चु गतिपूजनयोः−क्विन्। नलोपः ङीप्। यथा विषूचीः शब्दः, १।१९।१। प्रतिकूलं गच्छन्तीः। कृष्ण-वर्तने। वृतेश्च। उ० २।१०६। इति वृतु वर्तने−अनि। कृष्णा कृष्णावर्णा शतघ्नी भुशुण्ड्यादिप्रसारितधूमेन वर्तनिः वर्तिः पन्थाः यस्य सः, अग्निर्वा। हे कृष्णमार्ग, अग्निरूप सेनापते। सम्। सम्यक्, सर्वथा। धातु-धान्यः। पुंयोगादाख्यायाम्। पा० ४।१।४८। इति यातुधान−ङीप्, शसः स्थाने छन्दसि जस्। यणि कृते स्वरितः। यातुधानीः पीडादायिनीः शत्रुसेनाः ॥
