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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
युद्ध का प्रकरण।
पदार्थान्वयभाषाः - (पिनाकम् इव) त्रिशूल सा (बिभ्रती) उठाये हुए (कृन्तती) काटती हुयी [हमारी सेना] (विषूची) सब ओर फैल कर (एतु) चले। और (पुनर्भुवाः) फिर जुड़ कर आयी हुयी [शत्रुसेना] का (मनः) मन (विष्वक्) इधर-उधर उड़ाऊ [हो जावे] (अघायवः) बुरा चीतनेवाले शत्रु लोग (असमृद्धाः) निर्धन हो जावें ॥२॥
भावार्थभाषाः - जैसे चतुर सेनापति अस्त्र-शस्त्रवाली अपनी साहसी सेना के अनेक विभाग करके शत्रुओं पर झपट कर धावा मारता और उन्हें व्याकुल करके भगा देता है, जिससे वह लोग फिर न तो एकत्र हो सकते और न धन जोड़ सकते हैं, ऐसे ही बुद्धिमान् मनुष्य कुमार्गगामिनी इन्द्रियों को वश में करके सुमार्ग में चलावें और आनन्द भोगें ॥२॥ सायणभाष्य में (पुनर्भुवाः) के स्थान में [पुनर्भवाः] है ॥
टिप्पणी: २−विषूची। १।१९।१। नानाविधं गच्छन्ती, नानामुखी। एतु। गच्छतु। कृन्तती। कृती छेदने−शतृ। तुदादित्वात् शः। शे मुचादीनाम्। पा० ७।१।५९। इति नुम्, ततो ङीप्। छिन्दती, भिन्दती शत्रुसेना। पिना-कम्। पिनाकादयश्च। उ० ४।१५। पा रक्षणे पन स्तुतौ वा−आकप्रत्ययेन निपात्यते। त्रिशूलम्। बिभ्रती। १।१।१। डुभृञ् धारणपोषणयोः−शतृ। उगितश्च। पा० ४।१।६। इति ङीप्। धारयन्ती। विष्वक्। १।१९।१। नानामुखम्, अनवस्थितम्। पुनः−भुवाः। पुनः+भू सत्तायाम्−क्विप्। पुनः सङ्घीभूतायाः पृदाक्वाः, शत्रुसेनायाः−इत्यर्थः। मनः। चित्तम्। असम्−ऋद्धाः। ऋधु वृद्धौ−क्त। असम्पन्नाः, निर्धनाः। अघायवः। म० १। अनिष्टचिन्तकाः शत्रवः ॥
