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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
युद्ध का प्रकरण।
पदार्थान्वयभाषाः - (सुषूदत) तुम सब [हमें] अङ्गीकार करो और (मृडत) सुखी करो, [हे राजन् !] तू (नः) हमारे (तनूभ्यः) शरीरों को (मृडय) सुख दे और (तोकेभ्यः) बालकों को (मयः) आनन्द (कृधि) कर ॥४॥
भावार्थभाषाः - महाप्रतापी राजा और सुयोग्य कर्मचारी मिल कर सब प्रजा और उनकी सन्तानों की उत्तम शिक्षा आदि से उन्नति करें और सुख पहुँचाते रहें ॥४॥
टिप्पणी: ४−सुषूदत। षूद आश्रुतिहत्योः। निरासे च। आश्रुतिरङ्गीकारः। इति शब्दकल्पद्रुमः। अङ्गीकुरुत। मृडत। मृड सुखने। सुखयत। मृडय। सुखय। तनूभ्यः। १।१।१। शरीरेभ्यः। मयः। १।१३।२। सुखम्। १। तोकेभ्यः। १।१३।२। अपत्येभ्यः ॥
