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यू॒यं नः॑ प्रवतो नपा॒न्मरु॑तः॒ सूर्य॑त्वचसः। शर्म॑ यच्छाथ स॒प्रथः॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यूयम् । न: । प्रऽवत: । नपात् । मरुत: । सूर्यऽत्वचस: । शर्म । यच्छाथ । सऽमथा: ॥

अथर्ववेद » काण्ड:1» सूक्त:26» पर्यायः:0» मन्त्र:3


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

युद्ध का प्रकरण।

पदार्थान्वयभाषाः - (प्रवतः) हे [अपने] भक्त के (नपात्) न गिरानेहारे राजन् ! और (सूर्यत्वचसः) हे सूर्यसमान प्रतापवाले (मरुतः) शत्रुओं के मारनेहारे शूरवीर महात्माओ ! (यूयम्) तुम सब (नः) हमारे लिये (सप्रथः) बहुत विस्तीर्ण (शर्म) सुख वा शरण (यच्छाथ) दान करो ॥३॥
भावार्थभाषाः - अपने भक्तों की रक्षा करनेहारा राजा और महाप्रतापी धर्म-धुरंधर शूरवीर मन्त्री आदि मिल कर प्रजा की सर्वथा रक्षा करके अपने शरण में रक्खें ॥३॥
टिप्पणी: टिप्पणी−अजमेर वैदिक यन्त्रालय और बंबई गवर्नमेन्ट के पुस्तक के संहितापाठ में (सप्रथाः) पाठ अशुद्ध दीखता है, सायणभाष्य और बंबई के सेवकलाल कृष्णदास-शोधित पुस्तक का (सप्रथः) पाठ शुद्ध जान कर हमने यहाँ पर लिया है ॥ ३−यूयम्। प्रवतो नपात् मरुतश्च। प्र-वतः। १।१३।२। भक्तस्य, सेवकस्य। भक्तान्। द्वितीयायां बहुवचनं वा। नपात्। १।१३।२। न पातयतीति। हे अपातनशील राजन् ! मरुतः। १।२०।१। मारयन्ति शत्रून् ते। हे शूरवीराः पुरुषाः। सूर्य-त्वचसः। त्वच संवरणे−असुन्। सूर्यस्य त्वक् संवरणमिव संवरणं येषां ते। सूर्यसमानतेजस्काः। शर्म। १।२०।३। सुखम्, शरणम्। यच्छाथ। दाण् दाने−लेट्। प्रयच्छत, दत्त। स-प्रथः। सह+प्रथ ख्यातौ असुन्। प्रथसा सहितं, सविस्तारम् ॥