देवता: सविता, भग इन्द्रः
ऋषि: ब्रह्मा
छन्द: एकावसाना त्रिपदा साम्नी त्रिष्टुप्
स्वर: सुख प्राप्ति सूक्त
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
युद्ध का प्रकरण।
पदार्थान्वयभाषाः - (असौ) वह (रातिः) दानशील राजा (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (सखा) मित्र (अस्तु) होवे, (भगः) सबका सेवनीय, (सविता) लोकों को चलानेवाले सूर्य के समान प्रतापी, (चित्रराधाः) अद्भुत धनयुक्त (इन्द्रः) बड़े ऐश्वर्यवाला (सखा) मित्र (अस्तु) होवे ॥२॥
भावार्थभाषाः - राजा अपनी प्रजा, सेना और कर्मचारियों पर सदा उदारचित्त रहे और सूर्य के समान महाप्रतापी और ऐश्वर्यशाली और महाधनी होकर सबका हितकारी बने और सबकी उन्नति से अपनी उन्नति करे ॥२॥
टिप्पणी: २−सखा। १।२०।४। सुहृत्, मित्रम्। रातिः। क्तिच्क्तौ च संज्ञायाम्। पा० ३।३।१७४। इति रा दाने-क्तिच्। चितः। पा० ६।१।१६३। इति अन्तोदात्तः। उदारः, दाता राजा। इन्द्रः। १।२।३। परमैश्वर्यवान्। भगः। १।१४।१। भज सेवायाम्-घ। घत्वम्। सर्वैर्भजनीयः, सर्वैः सेवनीयः। सविता। १।१८।२। सर्वप्रेरकः। सर्ववशी, सूर्यवत् प्रतापी। त्रिचराधाः। चित्र+राध संसिद्धौ-असुन्। राध इति धननाम राध्नुवन्त्यनेनेति यास्कः−निरु० ४।४। विचित्रधनयुक्तः, अद्भुतधनः ॥
