पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
युद्ध का प्रकरण।
पदार्थान्वयभाषाः - (देवासः) हे विजयी शूरवीरो ! (असौ) वह (हेतिः) साँग वा बरछी (अस्मत्) हमसे (आरे) दूर (अस्तु) रहे और (अश्मा) वह पत्थर (आरे) दूर (असत्) रहे (यम्) जिसे (अस्यथ) तुम फैंकते हो ॥१॥
भावार्थभाषाः - युद्धकुशल सेनापति लोग चक्रव्यूह, पद्मव्यूह, मकरव्यूह, क्रौञ्चव्यूह, सूचीव्यूह आदि से अपनी सेना का विन्यास इस प्रकार करें कि शत्रु के अस्त्र-शस्त्र का प्रहार अपने प्रजा और सेना को न लगैं और न अपने अस्त्र-शस्त्र उलट कर अपने ही लगैं, किन्तु शत्रुओं का विध्वंस करैं ॥१॥
टिप्पणी: १−आरे। दूरे। असौ। सा शत्रुप्रयुक्ता। हेतिः। १।१३।३। खङ्गाद्यायुधं शक्तिनामास्त्रम्। देवासः। १।७।१। आज्जसेरसुक्। पा० ७।१।५०। इति असुक्। हे विजयिनो महात्मानः सेनापतयः। असत्। १।२२।२। भवेत्। अश्मा। १।२।२। मेघः, आयुधवृष्टिः। पाषाणः। यम्। अश्मानम्। अस्यथ। असु क्षेपणे-लट्, दिवादित्वात् श्यन्। यूयं क्षिपथ ॥
