ज्वर आदि रोग की शान्ति के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यदि) चाहे तू (अर्चिः) ज्वालारूप (यदि वा) अथवा (शोचिः) तापरूप (असि) है (यदि वा) अथवा (ते) तेरा (जनित्रम्) जन्मस्थान (शकल्येषि) अङ्ग-अङ्ग की गति में है। (हरितस्य) हे पीले रंग के (देव) देनेवाले (ह्रूडुः) दबाने की कल (नाम असि) तेरा नाम है, (सः) सो तू (तक्मन्) जीवन को कष्ट देनेवाले ज्वर ! [ज्वरसमान पीड़ा देनेवाले ईश्वर] (संविद्वान्) [यह बात] जानता हुआ (नः) हमको (परि वृङ्धि) छोड़ दे ॥२॥
भावार्थभाषाः - वह परब्रह्म ज्वर आदि रोग से दुष्कर्मियों की नाड़ी-नाड़ी को दुःख से दबा डालता है जैसे कोई किसी को दबाने की कल में दबावे। उस न्यायी जगदीश्वर का स्मरण करते हुए पापों से बच कर सदा आनन्द भोगें ॥२॥ सायणभाष्य में (ह्रूडुः) के स्थान में [रुढुः] पढ़ कर [रोहकः] उत्पन्न करनेवाला अर्थ किया है।