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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
महारोग के नाश के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ओषधे) हे उष्णता रखनेहारे अन्न आदि ओषधि (सरूपा) समान गुण वा स्वभाववाली (नाम) नाम (ते) तेरी (माता) माता है, (सरूपः) समान गुण वा स्वभाववाला (नाम) नाम (ते) तेरा (पिता) पिता है। (त्वम्) तू (सरूपकृत्) सुन्दर वा समान गुण करनेहारी है, (सा=सा त्वम्) सो तू (इदम्) इस [अङ्ग] को (सरूपम्) सुन्दररूपयुक्त (कृधि) कर ॥३॥
भावार्थभाषाः - (ओषधि) क्षुधा रोगादिनिवर्तक वस्तु को कहते हैं, जिससे शरीर में उष्णता रहती है, उसकी (माता) प्रकृति वा पृथिवी और (पिता) परमेश्वर वा मेघ वा सूर्य्य है, जिनके गुण वा स्वभाव सब प्राणियों के लिये समान हैं। ईश्वर से प्रेरित प्रकृति से अथवा भूमि और मेघ वा सूर्य्य के संयोग से सब पुष्टिदायक और रोगनाशक पदार्थ उत्पन्न होते हैं। विद्वान् लोग पदार्थों के गुणों को यथार्थ जान कर नियमपूर्वक उचित भोजन आदि के सेवन और यथोचित उपकार लेने से अपने को और अपने सन्तानों को रूपवान् और वीर्य्यवान् बनावें ॥३॥
टिप्पणी: ३−स-रूपा। म० २। समानं रूपं स्वभावो गुणो यस्याः सा। समानस्वभावाम्। नाम। अव्ययम्। नामन्सीमन्व्योमन्०। उ० ४।१५१। इति म्ना अभ्यासे−मनिन्। निपातनात् साधुः। म्नायते अभ्यस्यते यत्। प्रसिद्धा। प्रसिद्धम्। माता। १।२।१। माननीया जननी भूमिः प्रकृतिर्वा। स-रूपः। समानरूपः। समानस्वभावः, समानगुणः। पिता। १।२।१। पालको जनकः। परमेश्वरो मेघः सूर्यो वा। सरूप-कृत्। डुकृञ् करणो−क्विप्। ह्रस्वस्य पिति कृति तुक्। पा० ६।१।७१। इति तुक् आगमः। शोभनरूपकारिणी। समानगुणकारिणी। त्वम् ओषधे। १।२३।१। हे रोगनाशकद्रव्य त्वम्। स-रूपम्। सुन्दररूपयुक्तम्। इदम्। रोगदूषितम् अङ्गम्। कृधि। श्रुशृणुपॄकृवृभ्यश्छन्दसि। पा० ६।४।१०२। इति हेर्धिरादेशः। कुरु ॥
