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अ॑स्थि॒जस्य॑ कि॒लास॑स्य तनू॒जस्य॑ च॒ यत्त्व॒चि। दूष्या॑ कृ॒तस्य॒ ब्रह्म॑णा॒ लक्ष्म॑ श्वे॒तम॑नीनशम् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अस्थिऽजस्य । किलासस्य । तनूऽजस्य । च । यत् । त्वचि । दूप्या । कृतस्य । ब्रह्मणा । लक्ष्म । श्वेतम् । अनीनशम् ॥

अथर्ववेद » काण्ड:1» सूक्त:23» पर्यायः:0» मन्त्र:4


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

महारोग के नाश के लिये उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - “दूष्याकृतस्य अस्थिजस्य तनूजस्य च किलासस्य यत् श्वेतं लक्ष्म त्वचि अस्ति तद् ब्रह्मणा (अहम्) अनीनशम्−इत्यन्वयः। (दूष्या) दुष्ट क्रिया से (कृतस्य) उत्पन्न हुए, (अस्थिजस्य) हड्डी से उत्पन्न हुए (च) और (तनूजस्य) शरीर से निकले हुए (किलासस्य) रूप बिगाड़नेहारे, कुष्ठ आदि रोग का (यत्) जो (श्वेतम्) श्वेत (लक्ष्म) चिह्न (त्वचि) त्वचा पर है [उसको] (ब्रह्मणा) वेदविज्ञान से (अनीनशम्) मैंने नाश कर दिया है ॥४॥
भावार्थभाषाः - भारी रोग दो प्रकार के होते हैं, एक (अस्थिज) हड्डी से उत्पन्न होनेवाले अर्थात् भीतरी रोग जो ब्रह्मचर्य के खण्डन और कुपथ्य भोजन आदि के कारण मज्जा और वीर्य के विकार से हो जाते हैं और दूसरे (तनुज) शरीर से उत्पन्न हुए बाहिरी रोग जो मलिन वायु, मलिन घर, आदि के कारण होते हैं, इस प्रकार (ब्रह्मणा) वेदिक ज्ञान से रोगों का निदान करके उत्तम परीक्षित ओषधियों से रोगियों को स्वस्थ करे ॥४॥ इस सूक्त का आशय यह है कि जिस प्रकार सद्वैद्य रोगों का आदि कारण जानकर ओषधि करके रोगनिवृत्ति करता है, उसी प्रकार नीतिज्ञ राजा नियमपूर्वक दुष्टों का दमन करता है, सेनापति शत्रु के प्रहार से अपनी सेना की रक्षा करके जीत पाता है और ब्रह्मज्ञानी और वैज्ञानिक लोग बाह्य और आभ्यन्तर विघ्नों को हटाकर अपना कार्य सिद्ध करते हैं ॥
टिप्पणी: ४−अस्थि-जस्य। असिसञ्जिभ्यां क्थिन्। उ० ३।१५४। इति असु क्षेपणे-क्थिन्। अस्यते क्षिप्यते शरीरे तत् अस्थि, शरीरस्थ सप्तधातुमध्ये धातुविशेषः, कीकसम्। ततः। पञ्चम्यामजातौ। पा० ३।२।९८। इति जनी प्रादुर्भावे−ड प्रत्ययः। अस्थ्नो जातस्य मज्जाधातोः। किलासस्य। म० १। वर्णनाशकस्य कुष्ठरोगादिकस्य। तनू-जस्य। तन्वाः शरीराज् जायते, पूर्ववत् तनू+जनी−ड। शरीरजातस्य। यत्। लक्ष्म। त्वचि। तनोरनश्च वः। उ० २।६३। इति तनु विस्तारे−चिक प्रत्ययः, अन भागस्य वकारश्च। तन्यते विस्तीर्यते सा त्वक्। यद्वा। त्वच संवरणे−क्विप्। त्वचति संवृणोति भेदः शोणितादिकं सा। शरीरावरणे, चर्मणि। दूष्या। सर्वधातुभ्य इन्। उ० ४।११८। इति दुष वैरे, दुष्टकर्मणि−इन्। दूषयति प्राणिनं हिनस्तीति दूषिः, तया दुष्टक्रियया ब्रह्मचर्यखण्डनमद्यादिकुपथ्यसेवनरूपया। कृतस्य। उत्पादितस्य। ब्रह्मणा। १।८।४। वेदविज्ञानेन। लक्ष्म। सर्वधातुभ्यो मनिन्। उ० ४।१४५। इति लक्ष दर्शने−मनिन्। चिह्नम्। श्वेतम्। श्वित शुक्लतायाम्−अच् घञ् वा। शुक्लवर्णयुक्तम्। अनीनशम्। णश अदर्शने−णिचि लुङि रूपम्। अहं नाशितवानस्मि ॥