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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
महारोग के नाश के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ओषधे) हे ओषधि ! (ते) तेरा (प्रलयनम्) लाभ (असितम्) निर्बन्ध वा अखण्ड है और (तव) तेरा (आस्थानम्) विश्रामस्थान (असितम्) निर्बन्ध है, (असिक्नी असि) और तू निर्बन्ध [सारवाली] है, (इतः) इस पुरुष से (पृषत्) [विकृत] चिह्न को (निर्णाशय) सर्वथा नाश कर दे ॥३॥
भावार्थभाषाः - सद्वैद्य विचार करे कि यह ओषधि पूर्ण लाभयुक्त है, यथायोग्य स्थान में उत्पन्न हुई है और सब अंशों में सारयुक्त है, ऐसी ओषधि के प्रयोग से रोगनिवृत्ति होती है ॥३॥
टिप्पणी: ३−असितम्। अञ्चिघृसिभ्यः क्तः। उ० ३।८९। इति षिञ् बन्धने−क्त। अथवा। षो अन्तकर्मणि=नाशने-क्त। नञ्समासः। अबद्धम्, अखण्डितम्। कृष्णवर्णम्−इति सायणः। प्र-लयनम्। प्र+लीङ् श्लेषे, प्राप्तौ−ल्युट्। प्रापणं, प्राप्तिः, लाभः। आ-स्थानम्। आङ्+ष्ठा गतिनिवृत्तौ−ल्युट्। विश्रामस्थानम्। तव। त्वदीयम्। असिक्नी। म० १। अबद्धा, सारवती। ओषधे। म० १। हे रोगनाशकद्रव्य ! अन्यत् सुगमं व्याख्यातं च ॥
