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सुके॑षु ते हरि॒माणं॑ रोप॒णाका॑सु दध्मसि। अथो॒ हारि॑द्रवेषु ते हरि॒माणं॒ नि द॑ध्मसि ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सुकेषु । ते । हरिमाणम् । रोपणाकासु । दध्मसि । अथो इति । हारिद्रवेषु । ते । हरिमाणम् । नि । दध्मसि ॥

अथर्ववेद » काण्ड:1» सूक्त:22» पर्यायः:0» मन्त्र:4


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

रोगनाश के लिये उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (सुकेषु) उत्तम-उत्तम उपदेशों में और (रोपणाकासु) लेप आदि क्रियाओं में (ते) तेरे (हरिमाणम्) सुख हरनेवाले शरीररोग को (दध्मसि) हम रखते हैं। (अथो) और भी (हारिद्रवेषु) रुचिर रसों में (ते) तेरे (हरिमाणम्) चित्तविकार को (नि) निरन्तर (दध्मसि) हम रखते हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - सद्वैद्य बाहिरी शारीरिक रोगों को यथायोग्य ओषधि और लेप आदि से और भीतरी मानसिक रोगों को उत्तम-उत्तम ओषधिरसों से नाश करके रोगी को स्वस्थ करें ॥४॥ यह मन्त्र ऋ० १।५०।१२। में कुछ भेद से है, वहाँ (सुकेषु) के स्थान में [शुकेषु] है। और सायणभाष्य में भी [शुकेषु] माना है। परन्तु तीनों अथर्वसंहिताओं में (सुकेषु) पाठ है, वही हमने लिया है। सायणाचार्य ने [शुक] का अर्थ तोता पक्षी और [रोपणाका] का [काष्ठशुक] नाम हरिद्वर्ण पक्षी अथर्ववेद में और [शारिका पक्षी विशेष] अर्थात् मैना ऋग्वेद में और (हारिद्रव) का अर्थ [गोपीतनक नाम हरिद्वर्ण] [पक्षी] अथर्ववेद में और [हरिताल का वृक्ष] ऋग्वेद में किया है। इस अर्थ का यह आशय जान पड़ता है कि रोगविशेषों में पक्षीविशेषों को रोगी के पास रखने से भी रोग की निवृत्ति होती है ॥
टिप्पणी: ४−सुकेषु। अन्येष्वपि दृश्यते। पा० ३।२।१०१। इति सु०+कै+शब्दे, यद्वा, कच दीप्तौ−ड। उत्तमेषु शब्देषु। उपायकथनेषु। हरिमाणम्। म० १। रोगजनितं हरिद्वर्णम्, सुखहरणशीलं रोगं शारीरिकं हार्दिकं वा। रोपणाकासु। रोपण−आकासु। रुह प्रादुर्भावे, णिच्−ल्युट्, हस्य पः। व्रण रोगे मांसाङ्कुरजननार्थक्रियादिकम् इति रोपणम्, ततः, आ+कम कान्तौ−ड ॥रोपणं समन्तात् कामयन्ति तासु क्रियासु लिप्तास्वोषधिषु−इति श्रीमद्दयानन्दभाष्यम् ऋ० १।५०।१२। दध्मसि। म० १। वयं धारयामः, स्थापयामः। हारिद्रवेषु। वसिवपियजि०। उ० ४।१२५। इति हृञ् हरणे−इञ्। हरति रोगमिति हारिः, रुचिरः, मनोहरः। ॠदोरप्। पा० ३।३।५७। इति द्रु द्रवणे स्रवणे−अप्। इति, द्रवः, रसः। रुचिररसेषु। नि। नियमेन ॥