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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजनीति और शान्तिस्थापन का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (रक्षः=रक्षांसि) राक्षसों और (मृधः) हिंसकों को (वि वि) सर्वथा (जहि) तू मार डाल, (वृत्रस्य) शत्रु के (हनू) दोनों जावड़ों को (विरुज) तोड़ दे (वृत्रहन्) हे अन्धकार मिटानेहारे (इन्द्र) बड़े ऐश्वर्यवाले राजन् ! (अभिदासतः) चढ़ाई करनेहारे (अमित्रस्य) पीडाप्रद शत्रु के (मन्युम्) कोप को (वि=विरुज) भङ्ग कर दे ॥३॥
भावार्थभाषाः - १−राजा को पुरुषार्थी होकर शत्रुओं का नाश करके और प्रजा में शान्ति फैलाकर आनन्द भोगना चाहिये ॥ २−सर्वरक्षक परमेश्वर के प्रताप से मनुष्य अपने बाहिरी और भीतरी शत्रुओं को निर्बल करें ॥३॥
टिप्पणी: ३−रक्ष। रक्ष पालने−असुन्। रक्षो रक्षितव्यमस्मात्−निरु० ४।१८। जातावेकवचनम्। राक्षसम्। शत्रुम्। वि। विशेषण, सर्वथा। मृधः। म० २। मर्धयितॄन्, हिंसकान्। जहि। म० २। नाशय। वृत्रस्य। म० १। शत्रोः। हनू। शॄस्वृस्निहि०। उ० १।१०। इति हन वधे−उ प्रत्ययः। हन्ति कठोर−द्रव्यादिकमिति हनुः। कपोलद्वयोपरिमुखभागौ। रुज। रुजो भङ्गे तुदादिः। भङ्गधि। विदारय। वि−विरुज। मन्युम्। १।१०।१। क्रोधं, कोपम्। वृत्र-हन्। म० १। हे अन्धकारनाशक ! अमित्रस्य। १।१९।२। पीडकस्य, शत्रोः। अभि-दासतः। दसु उत् क्षेपे−शतृ। उपक्षपयतः, उत्-क्षेपणशीलस्य ॥
