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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शत्रुओं से रक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इत्था) सत्य-सत्य (महान्) बड़ा (शासः) शासनकर्ता (अमित्रसाः) शत्रुओं को हरानेहारा और (अस्तृतः) कभी न हारनेहारा (असि) तू है। (यस्य) जिसका (सखा) मित्र (कदा चन) कभी भी (न) न (हन्यते) मारा जाता है और (न) न (जीयते) जीता जाता है ॥४॥
भावार्थभाषाः - वह परमात्मा (वरुण) सर्वशक्तिमान् शत्रुनाशक है, इस प्रकार श्रद्धा करके जो मनुष्य प्रयत्नपूर्वक, आत्मिक, शारीरिक और सामाजिक बल बढ़ाते रहते हैं, वे ईश्वर के भक्त दृढ़विश्वासी अपने शत्रुओं पर सदा जय प्राप्त करते हैं ॥४॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋ० १०।१५२।१ में है ॥
टिप्पणी: ४−शासः। नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः। पा० ३।१।१३४। इति शासु अनुशिष्टौ−पचाद्यच्। चितः। पा० ६।१।१६३। इति अन्तोदात्तः। शासकः, नियन्ता, वरुणः। इत्था। सत्यनाम, निघ० ३।१०। सत्यम्। महान्। १।१०।४। सर्वोत्कृष्टः। महाँ असि। इत्यत्र संहितायाम्। दीर्घादटि समानपादे। पा० ८।३।९। इति नकारस्य रुत्वम्। आतोऽटि नित्यम्। पा० ८।३।३। इति अकारस्य अनुनासिकः। अमित्र-सहः। अमेर्द्विषति चित्। उ० ४।१७४। इति अम रोगे पीडने−इत्रच्। षह अभिभवे−पचाद्यच्। चितः। पा०। ६।१।१६३। इति अन्तोदात्तः। अमित्राणां शत्रूणां सोढा, अभिभविता। अस्तृतः। स्तृञ् हिंसायाम्−कर्मणि क्तः। अहिंसितः। न। निषेधे। यस्य। वरुणस्य। हन्यते। सार्वधातुके यक्। पा० ३।१।६७। इति कर्मणि यक्। हिंस्यते। अभिभूयते। सखा। समाने ख्यः स चोदात्तः। उ० ४।१३७। इति समान+ख्या प्रसिद्धौ कथने च−इन्। टिलोपयलोपौ समानस्य सभावश्च। अनङ् सौ। पा० ७।१।९३। इति अनङ्। मित्रम्, सुहृद्। जीयते। जि जये−पूर्ववद् यक्। अभिभूयते। कदा। कस्मिन् काले। चन। अपि ॥
