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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
शत्रुओं से रक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अद्य) आज (अघायूनाम्) बुरा चीतनेवाले शत्रुओं की (सेन्यः) सेना का चलाया हुआ (यः) जो (वधः) शस्त्रप्रहार (उदीरते) उठ रहा है। (मित्रावरुणौ) हे [हमारे] प्राण और अपान (युवम्) तुम दोनों (तम्) उस [शस्त्रप्रहार] को (अस्मत्) हम लोगों से (परि) सर्वथा (यावयतम्) अलग रक्खो ॥२॥
भावार्थभाषाः - (मित्रावरुणौ) का अर्थ महर्षि दयानन्द सरस्वती ने [य० २।३] प्राण और अपान किया है। जो वायु शरीर के भीतर जाता है, वह प्राण और जो बाहिर निकलता है, वह अपान कहाता है। जिस समय युद्ध में शत्रुसेना आ दबावे, उस समय अपने प्राण और अपान वायु को यथायोग्य सम रखकर और सचेत होकर शरीर में बल बढ़ाकर सैन्यक लोग युद्ध करें, तो शत्रुओं पर शीघ्र जीत पावें ॥ २−श्वास के साधने से मनुष्य स्वस्थ और बलवान् होते हैं ॥ ३−प्राण और अपान के समान उपकारी और बलवान् होकर योद्धा लोग परस्पर रक्षा करें ॥
टिप्पणी: २−अद्य। १।१।१। वर्तमाने दिने। सेन्यः। भवे छन्दसि। पा० ४।४।११०। इति सेना−यत्। सेनायां भवः। वधः। हनश्च वधः। पा० ३।३।६७। इति हन हिंसागत्योः−अप्, वधादेशः। हननसाधनः, शस्त्रप्रहारः। अघायूनाम्। अघ पापकरणे−अच्। अघम्, पापम्। सुप आत्मनः क्यच्। पा० ३।१।८। इत्यत्र। छन्दसि परेच्छायामपि वक्तव्यम्। वार्त्तिकम्। इति अघ−क्यच्। क्याच्छन्दसि। पा० ३।२।१७०। इति उ प्रत्ययः। अश्वाघस्यात्। पा० ७।४।३७। इति आत्वम्। पापेच्छूनाम्। दुराचारिणाम्। उत्−ईरते। ईर गतौ। उद्गच्छति, उत्तिष्ठति। युवम्। युवाम्। मित्रावरुणौ। १।३।२, ३। मित्रश्च वरुणश्च। देवता द्वन्दे च। पा० ६।३।२९। इति पूर्वपदस्य आनङ् आदेशः। प्राणापानौ। यावयतम्। यु मिश्रणामिश्रणयोः−ण्यन्तात् लोट्। वियोजयतम्, पृथक् कुरुतम्।
