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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के लिये धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (रिश्यपदीम्) हरिण के समान [बिना जमाये शीघ्र] पद की चेष्टा, (वृषदतीम्) बैल के समान दाँत चबाना, (गोषेधाम्) बैल की सी चाल, (उत) और (विधमाम्) बिगड़ी भाथी [धोंकनी] के समान श्वासक्रिया, (ललाम्यम्=०-मीम्) रुचि नाश करनेहारी (विलिढ्यम्=०-ढिम्) चाटने की बुरी प्रकृति, (ताः) इन सब [कुचेष्टाओं] को (अस्मत्) अपने से (नाशयामसि=०-मः) हम नाश करें ॥४॥
भावार्थभाषाः - सब स्त्री-पुरुष मनुष्यस्वभाव से विरुद्ध कुचेष्टाओं को छोड़कर विद्वानों के सत्सङ्ग से सुन्दर स्वभाव बनावें और मनुष्यजन्म को सुफल करके आनन्द भोगें ॥४॥
टिप्पणी: टिप्पणी−सायणभाष्य में (रिश्यपदीम्) के स्थान में (ऋष्यपदीम्) पाठ है। और जो (विलीढ्यम्, ललाम्यम्) पदों को नपुंसकलिङ्ग माना है, वह अशुद्ध है, क्योंकि मन्त्र में (ताः) स्त्रीलिङ्ग सर्वनाम होने से ऊपर के सब छह पद स्त्रीलिङ्ग हैं ॥ ४−रिश्य-पदीम्। रिश हिंसे-क्यप्। रिश्यते हिंस्यते−इति रिश्यः मृगः। पादस्य लोपोऽहस्त्यादिभ्यः। पा० ५।४।१३८। इति पादस्य अन्त्यलोपः। पादोऽन्यतरस्याम्। पा० ४।१।८। इति ङीप्, भसंज्ञायां पादः पत्। पा० ६।४।१३०। इति पद्भावः। हरिणपदवद् गतिं कुचेष्टाम्। वृष-दतीम्। अग्रान्तशुद्धशुभ्रवृषवराहेभ्यश्च। पा० ५।४।१४५। इति दन्तशब्दस्य दतृ आदेशः। उगितश्च। पा० ४।१।६। इति ङीप्। वृषदन्तवत् क्रियायुक्तां कुचेष्टाम्। गो-सेधाम्। षिधु गत्याम्−पचाद्यच्। टाप्। वृषभवद् गतिं चेष्टां वि-धमाम्। वि विकृतौ+ध्मा, धम वा, दीर्घश्वासहेतुके शब्दभेदे−अच्। टाप्। विधमावद् विकृत-भस्त्रावत् श्वासक्रियाम्। विलीढ्यम्। वि विकृतौ+लिह आस्वादने+क्तिन्। वा छन्दसि। पा० ६।१।१०६। इति अमि पूर्वरूपाभावे। इको यणचि। पा० ६।१।७७। इति यण् आदेशः। उदात्तस्वरितयोर्यणः स्वरितोऽनुदात्तस्य। पा० ८।२।४। इति यणः परतोऽनुदात्तस्य स्वरितः। विलीढिम्, विकृतास्वादनचेष्टाम्। ललाम्यम्। म० १। ललामीम्, रुचिनाशिनीम्। ताः। पूर्वोक्ताः कुचेष्टाः। नाशयामसि। णश अदर्शने−णिच्। मस इदन्तत्वम्। नाशयामः, दूरीकुर्मः ॥
