राजा के लिये धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सविता) [सबका चलानेहारा] सूर्य [सूर्यरूप तेजस्वी], (वरुणः) सबके चाहनेयोग्य जल [जलसमान शान्तस्वभाव], (मित्रः) चेष्टा देनेहारा वायु [वायु समान वेगवान् उपकारी], (अर्यमा) श्रेष्ठों का मान करनेहारा न्यायकारी राजा (अरणिम्) पीडा को (पदोः) दोनों पदों और (हस्तयोः) दोनों हाथों से (निः) निरन्तर (निः साविषत्) निकाल देवे। (रराणा) दानशीला (अनुमतिः) अनुकूल बुद्धि (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (निः=निः साविषत्) [पीडा को] निकाल देवे, (देवाः) उदार चित्तवाले महात्माओं ने (इमाम्) इस [अनुकूल बुद्धि] को (सौभगाय) बड़े ऐश्वर्य के लिये (प्र असाविषुः) भेजा है ॥२॥
भावार्थभाषाः - मन्त्रोक्त शुभ लक्षणोंवाला राजा और प्रजा परस्पर हितबुद्धि से और शुभचिन्तक महात्माओं के सहाय से क्लेशों का नाश करके सबका ऐश्वर्य बढ़ावें ॥२॥