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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ऐश्वर्य की प्राप्ति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (नदीनाम्) नाद करनेवाली नदियों के (ये) जो (अक्षिताः) अक्षय (उत्सासः) स्रोते (सदम्) सर्वदा (संस्रवन्ति) मिलकर बहते हैं। (तेभिः सर्वैः) उन सब (संस्रावैः) जलप्रवाहों के साथ (मे) अपने (धनम्) धनको (सम्) उत्तम रीति से (स्रावयामसि) हम व्यय करें ॥३॥
भावार्थभाषाः - जैसे पर्वतों पर जल के सोते मिलने से वेगवती और उपकारिणी नदिएँ बनती हैं, जो ग्रीष्मऋतु में भी नहीं सूखतीं, इसी प्रकार हम सब मिलकर विज्ञान और उत्साहपूर्वक तडित्, अग्नि, वायु, सूर्य, जल, पृथिवी आदि पदार्थों से उपकार लेकर अक्षय धन बढ़ावें और उसे उत्तम कर्मों में व्यय करें ॥३॥
टिप्पणी: ३−नदीनाम्। १।८।१। नदनशीलानां सरिताम्, सरस्वतीनाम्। सम्-स्रवन्ति। सम्भूय प्रवहन्ति। उत्सासः। उन्दिगुधिकुषिभ्यश्च। उ० ३।६८। इति उन्दी क्लेदे−स प्रत्ययः। आज्जसेरसुक्। पा० ७।१।५०। इति जसि असुक् आगमः। उत्सः कूपनाम−निघ० ३।२३। जलस्रवणस्थानानि, स्रोतांसि। सदम्। सर्वदा, ग्रीष्मादावपि। अक्षिप्ताः। क्षि क्षये-क्त। अक्षीणाः। तेभिः। बहुलं छन्दसि। पा० ७।१।१०। इति भिस ऐस्भावः। तैः। मे। मम=अस्माकम्। एकवचनं बहुवचने। सम्-स्रावैः। श्याऽऽद्व्यधास्रुसंस्रवतीण०। पा० ३।१।१४१। इति सम्+स्रु स्रवणे-ण प्रत्ययः। अचो ञ्णिति। पा० ७।२।११५। इति वृद्धिः। प्रवाहैः। धनम्। धन धान्ये−अच् यद्वा, कृपॄवृजिमन्दिनिधाञः क्युः। उ० २।८१। इति डुधाञ् धारणपोषणयोः क्यु। वित्तम्, सम्पदम्। स्रावयामसि। स्रु स्रवणे−णिचि लट्, इदन्तो मसि। पा० ७।१।४६। इति मस इदन्तता। स्रावयामः, प्रवाहयामः, व्ययं कुर्मः ॥
