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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विवाहसंस्कार का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (राजन्) हे वर राजा (एषा) यह कन्या (ते) तेरे (कुलपाः) कुल की रक्षा करनेहारी है, (ताम्) उसको (उ) ही (ते) तेरे लिये (परि) आदर से (दद्मसि) हम दान करते हैं। यह (ज्योक्) बहुत काल तक (पितृषु) तेरे माता-पिता आदिकों में (आसातै) निवास करे और (आशीर्ष्णः) अपने मस्तक तक [जीवनपर्यन्त वा बुद्धि की पहुँच तक] (समोप्यात्) ठीक-ठीक बढ़ती का बीज बोवे ॥३॥
भावार्थभाषाः - फिर वधूपक्षवाले माता-पिता आदि इस मन्त्र से जामाता की विनती करते और स्त्री-धर्म का उपदेश करते हुए कन्यादान करके गृहाश्रम में प्रविष्ट कराते हैं ॥३॥
टिप्पणी: ३−कुलपाः। कुल+पा रक्षणे−कर्मण्युपपदे विच् प्रत्ययः। पातिव्रत्येन कुलस्य पालयित्री रक्षयित्री। राजन्। हे ऐश्वर्यवन् जामातः। ऊँ इति। अवश्यम्। परि+दद्मसि। इदन्तो मसिः। पा० ७।१।४६। इति मस इदन्तत्वम्। रक्षणार्थं दानं परिदानम्। रक्षणार्थं दद्मः, समर्पयामः। ज्योक्। म० १। दीर्घकालम्। पितृषु। म० १। मातापित्रादिबन्धुषु। आसातै। आस उपवेशने−लेटि आडागमः। टेः एत्वे। वैतोऽन्यत्र। पा० ३।४।९६। इति ऐकारः। आस्ताम्, निवसतु। आ-शीर्ष्णः। १।७।७। आङ् मर्यादावचने। पा० १।४।८९। इति आङः कर्मप्रवचनीयसंज्ञा। पञ्चम्यपाङ्परिभिः। पा० २।३।१०। इति पञ्चमी। शीर्षंश्छन्दसि। पा० ६।१।६०। इति शिरः शब्दस्य शीर्षन् आदेशः। मस्तकस्थितिपर्यन्तं, जीवनपर्य्यन्तम्। सम्-ओप्यात्=सम्+आ+उप्यात्। वप बीजवपने मुण्डने च-आशीर्लिङ्। यथामर्यादं बीजवपनं वर्धनं कुर्य्यात् ॥३॥
