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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रोगनिवृत्ति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (मे) मेरे (परस्मै) ऊपर के (गात्राय) शरीर के लिये (शम्) सुख और (मे) मेरे (अवराय) नीचे के शरीर के लिये (शम्) सुख (अस्तु) होवे। (मे) मेरे (चतुर्भ्यः) चारों (अङ्गेभ्यः) अङ्गों के लिये (शम्) सुख और (मम) मेरे (तन्वे) सब शरीर के लिये (शम्) सुख (अस्तु) होवे ॥४॥
भावार्थभाषाः - चारों अङ्ग दो हाथ और दो पद हैं। मनुष्य को योग्य है कि परमेश्वर की प्रार्थनापूर्वक अपने सब अमूल्य शरीर को प्रयत्न से सर्वथा स्वस्थ रक्खे और मानसिक बल बढ़ा कर संसार में उपकारी हो और सदा सुख भोगे ॥४॥
टिप्पणी: ४−परस्मै। १।८।३। श्रेष्ठाय, उपरि वर्तमानाय। गात्राय। गमेरा च। उ० ४।१६९। इति गम्लृ-त्रन्, मस्य आकारः। गच्छति चेष्टतेऽनेन। अङ्गाय, शरीराय। अवराय। १।८।३। निकृष्टाय, अवस्ताद् वर्तमानाय। चतुः-भ्यः। चतुःसंख्येभ्यः। द्वौ हस्तौ, द्वौ पादौ−इति चत्वारि तेभ्यः। अङ्गेभ्यः। अङ्ग पदे=गतौ-अच्। अङ्गयति चेष्टतेऽनेन। अवयवेभ्यः, गात्रेभ्यः। तन्वे। म० १। शरीराय सर्वस्मै ॥
