वांछित मन्त्र चुनें

यथा॒ वातो॒ यथा॒ मनो॒ यथा॒ पत॑न्ति प॒क्षिणः॑। ए॒वा त्वं द॑शमास्य सा॒कं ज॒रायु॑णा प॒ताव॑ ज॒रायु॑ पद्यताम् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यथा वातो यथा मनो यथा पतन्ति पक्षिणः । एवा त्वं दशमास्य साकं जरायुणा पताव जरायु पद्यताम् ॥

अथर्ववेद » काण्ड:1» सूक्त:11» पर्यायः:0» मन्त्र:6


0 बार पढ़ा गया

पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

सृष्टिविद्या का वर्णन।

पदार्थान्वयभाषाः - (यथा) जैसे (वातः) पवन और (यथा) जैसे (मनः) मन और (यथा) जैसे (पक्षिणः) पक्षी (पतन्ति) चलते हैं। (एव) वैसे ही (दशमास्य) हे दस महीनेवाले [गर्भ के बालक !] (त्वम्) तू (जरायुणा साकम्) जरायु के साथ (पत) नीचे आ, (जरायु) जरायु (अव) नीचे (पद्यताम्) गिर जावे ॥६॥
भावार्थभाषाः - (दशमास्य) दशवें अथवा ग्यारहवें महीने में बालक माता के गर्भ में बहुत शीघ्र चेष्टा करता है, तब वह उत्पन्न होता है और जरायु वा जेली कुछ उस के साथ और कुछ उसके पीछे निकलती है ॥६॥ ऋग्वेद म० ५ सू० ७८ म० ८ में इस प्रकार है। यथा॒ वातो॒ यथा॒ वनं॒ यथा॑ समु॒द्र एज॑ति। ए॒वा त्वं द॑शमास्य स॒हावे॑हि ज॒रायु॑णा ॥१॥ जैसे वायु, जैसे वृक्ष और जैसे समुद्र हिलता है, ऐसे ही तू हे दस महीनेवाले [गर्भ के बालक !] जरायु के साथ नीचे आ। शब्दकल्पद्रुम कोश में लिखा है। अष्टमे मासि याते च अग्नियोगः प्रवर्तते। मासे तु नवमे प्राप्ते जायते तस्य चेष्टितम् ॥१॥ जायते तस्य वैराग्यं गर्भवासस्य कारणात्। दशमे च प्रसूयेत तथैकादशमासि वा ॥२॥ आठवाँ महीना आने पर अग्नियोग होता है और नवमे महीने में उस [गर्भ] में चेष्टा होती है ॥१॥ गर्भ में वास करने के कारण उसको वैराग्य (उच्चाटन) होता है, तब दसवें अथवा ग्यारहवें महीने में वह उत्पन्न होता है ॥२॥ इति द्वितीयोऽनुवाकः ॥
टिप्पणी: ६−यथा। येन प्रकारेण। वातः। हसिमृग्रिण्वा०। उ० ३।८६। इति वा सुस्वाप्तिगतिसेवासु−तन्। नित्त्वाद् आद्युदात्तः। वायुः, पवनः। मनः। १।१।२। ज्ञानसाधकम् अन्तःकरणम्। पतन्ति। शीघ्रं गच्छन्ति उड्डीयन्ते। पक्षिणः। अत इनिठनौ। पा० ५।२।११५। इति पक्ष−इनि। विहगाः। एव। निपातस्य च। पा० ६।३।१३६। इति दीर्घः। एवम्, तथा। दश-मास्य। तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारे च। पा० २।१।५१। इति तद्धितार्थे विषयभूते समासः। संख्यापूर्वो द्विगुः। पा० २।१।५२। इति द्विगुसंज्ञायाम्। द्विगोर्यप्। पा० ५।१।८२। इति भरणार्थे यप्। हे दशसु मासेषु मात्रा पोषित शिशो। साकम्। सह। सहयुक्तेऽप्रधाने। पा० २।३।१९। इति सहार्थेन साकं शब्देन योगे जरायुणा इति अप्राधान्ये तृतीया। पत। अधो गच्छ। अव। इत्यादि गतं म० ४॥