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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सृष्टिविद्या का वर्णन।
पदार्थान्वयभाषाः - (दिवः) आकाश की (चतस्रः) चारों (उत) और (भूम्याः) भूमि की (चतस्रः) चारों (प्रदिशः) दिशाओं ने और (देवाः) दिव्य गुणवाले [अग्नि वायु आदि] देवताओं ने (गर्भम्) गर्भ को (समैरयन्) संगत किया है, वे सब (तम्) उस गर्भ को (सूतवे) उत्पन्न होने के लिये (व्यूर्णुवन्तु) प्रस्तुत करें ॥२॥
भावार्थभाषाः - अग्नि आदि दिव्य पदार्थों के यथार्थ संयोग से ईश्वरीय नियम के अनुसार यह गर्भ स्थिर हुआ है, मनुष्य उन तत्त्वों की अनुकूलता को, माता और गर्भ में, स्थिर रखने के लिये सदा प्रयत्न करते रहें, जिससे बालक बलवान् और नीरोग होकर पूरे समय पर उत्पन्न होवे ॥२॥
टिप्पणी: २−टिप्पणी−देव वा देवता का अर्थ दिव्य वा अच्छे गुणवाला है। यजुर्वेद १४।२०। में ये देवता कहे हैं। अ॒ग्निर्दे॒वता॑। वातो॑ दे॒वता॑। सूर्यो दे॒वता॑। च॒न्द्रमा॑ दे॒वता॑। वस॑वो दे॒वता॑। रु॒द्रो दे॒वता॑। आ॒दि॒त्या दे॒वता॑। म॒रुतो॑ दे॒वता॑। विश्वे॑दे॒वा दे॒वता॑। बृह॒स्पति॑र्दे॒वता॑। इन्द्रो॑ दे॒वता॑। वरु॑णो दे॒वता॑ ॥ अग्नि १, वायु २, सूर्य ३, चन्द्रमा ४, सबके बसानेवाले अन्नादि पदार्थ ५, दुःख दूर करनेवाले जीव वा पदार्थ ६, प्रकाश करनेवाले पदार्थ अथवा अदिति, विद्या वा पृथिवी के पुत्र के समान सेवा करनेवाले पुरुष ७, दुष्टों के मारनेवाले शूरवीर पुरुष ८, सब अच्छे गुणवाले विद्वान् ९, बड़े वेदवचनों वा ब्रह्माण्डों का रक्षक परमेश्वर १०, ऐश्वर्य वा धन ११ और जल १२, यह सब (देवता) उत्तम गुणवाले हैं ॥ चतस्रः। त्रिचतुरोः स्त्रियां तिसृचतसृ। पा० ७।२।९९। इति चतुर्शब्दस्य जसि चतस्रादेशः। अचि र ऋतः। पा० ७।२।१००। इति रेफादेशः। चतुःसंख्याकाः। दिवः। १।११।२। आकाशस्य। प्र-दिशः। १।९।२। प्रकृष्टा दिशः। प्राच्याद्याः प्रधानदिशः। भूम्याः। भुवः कित्। उ० ४।४५। इति भू सत्तायां-मि। कृदिकारादक्तिनः। इति पक्षे ङीष्। पृथिव्याः, भूलोकस्य। देवाः। १।४।३। दिव्यपदार्था अग्न्यादयः। विद्वांसश्च। गर्भम्। अर्त्तिगॄभ्यां भन्। उ० ४।१५२। इति गॄ विज्ञापने, निगरणे च भन्। गीर्यते संचितकर्मफलदात्रा ईश्वरेण प्रकृतिबलात् जठरगह्वरे स्थाप्यते पुरुषशुक्रयोगेण स गर्भः। भ्रूणम्, उदरस्थसन्तानम्। सम्। सम्यक्, यथाविधि। ऐरयन्। ईर गतौ लङ्। संगतमकुर्वन्। वि+ऊर्णुवन्तु। ऊर्णुञ् आच्छादने-लोट्। विवृतं प्रस्तुतं कुर्वन्तु। सूतवे। तुमर्थे सेसेनसे०। पा० ३।४।९। इति षूङ् प्राणिगर्भविमोचने−तवेन्। नित्त्वात् आद्युदात्तः। प्रसवितुम् ॥
